आध्यात्मिकता ही मानवता का भविष्य है – कीर्ति अधिकारी 

ज्योतिर्मठ, 6 जनवरी 2026 ।  21वीं सदी की कुंडली बाँचते हुए फ्रेंच लेखक और नेता आंद्रे मलरॉक्स ने कहा है : “The twenty-first century will be spiritual or it will not be”. अर्थात “21वीं सदी या तो आध्यात्मिक होगी अथवा होगी ही नहीं”।

‘होगी ही नहीं’ — की कल्पना भी भयानक है। ‘आध्यात्मिक होगी’—में एक सुकून और संभावना की खिड़की खुलती है…।

प्रकृति का दम घोटने वाले विकास के आत्मघाती मॉडलों , दुश्मनी की हद तक जाने वाले राजनैतिक प्रपंचों, पहली दुनिया और तीसरी दुनिया के बीच बढ़ती विषमताओं और आर्थिक-सामाजिक विभाजन रेखाओं, पहाड़ की चोटियों पर सिमटती बर्फ़ और इंसान की दुनिया में आराम , उपलब्धि, सूचना, सुविधा, संचार आदि के तमाम शोर के बाद भी भीतर जो रीतापन है ,उसे भरने की एक बड़ी उम्मीद आध्यात्मिकता है।

 

आध्यात्मिकता व्यक्ति की भी उम्मीद है और समाज की भी।

यह प्रकृति संरक्षण का सर्वश्रेष्ठ मंत्र भी है और मनुष्य को उसकी आदिम पशुता से मुक्त करने वाला यंत्र भी । अमेरिकी विचारक थोरो ने 1854 में ही कह दिया है : Simplicity ! simplicity ! simplicity !

 

अभी तक हमें सारी समस्या और अपूर्णता बाहर दिखाई दे रही है, सारी खूबियां अपने में और खामियां दूसरों में दिखाई दे रही है लेकिन आध्यात्मिकता का दर्पण हमें बताता है कि बाहर की दुनिया भीतर की दुनिया पर निर्भर करती है ! बोध के इन्हीं पलों कबीर ‘मुझसे बुरा न कोई’ की आत्म- स्वीकृति करते हैं।

लेकिन इंस्टेंट नूडल्स को ही भारत का स्वाद समझने वाली दुनिया न कबीर को सुनती है और न थोरो को गुनती है….।

आज जब मुख्यधारा के मीडिया के अलावा सोशल मीडिया पर भावना और विचार के नुकीले पत्थर हम एक दूसरे की ओर उछाल रहे हैं और हमारे बर्बर ( श्रीअरविन्द ने ‘बर्बर’ उस आत्मकेंद्रित इंसान को कहा है जिसका पूरा ध्यान अपने शरीर के पोषण और सुरक्षा पर होता है) धनपशु होने की होड़ ने प्रकृति और पर्यावरण से उसका वसंत छीन लिया है, तब तो और भी ज़रूरी है कि उस जीवनदृष्टि की ज़रूरी पड़ताल हो जो ‘गैरज़रूरी’ की का गुणगान करती है….।

जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में ज्योतिर्मठ के प्रतिष्ठित चिकित्सक और समाजसेवी डॉ. मोहन सिंह रावत के “रमणीक होम स्टे” (निकट श्री हनुमान शिला बड़ागाँव) में श्रीअरविन्द अध्ययन केंद्र ज्योतिर्मठ से जुड़े युवा साधकों और सदस्यों ने “युवा और आध्यात्मिकता” पर गहन मंथन किया।

कार्यशाला का संचालन श्रीअरविन्द सोसायटी पुदुचेरी की कोर कमेटी सदस्य श्रीमती कीर्ति अधिकारी ने किया। श्रीअरविन्द और श्रीमाँ के प्रेरक जीवन मंत्रों का उद्धरण देते हुए कीर्ति दीदी ने आसान भाषा में समझाया कि एक आध्यात्मिक दृष्टि का विकास करके हम किस तरह अपने दैनिक/कामकाजी जीवन को अधिक सुंदर, व्यवस्थित और आनंदमय बना सकते हैं… उन्होंने बोध कथाओं से मानव जीवन के अनेक प्रश्नों और पहेलियों को समझाया। कार्यशाला में फॉक्स्टोन इंग्लैंड की निवासी आर्टिस्ट और क्यूरेटर डायना डेवर ने प्रतिभागियों से चित्रकारी करवाकर मनुष्य की पर्यावरण के रिश्ते को फिर से समझाने की कोशिश की। नीदरलैंड्स में रहने वाले युवा उद्यमी और वैज्ञानिक डॉ. अभय अधिकारी ने कहा कि आध्यात्मिकता को समझने की पहली पाठशाला प्रकृति है और आज उसी के अस्तित्व पर सबसे ज्यादा संकट है। बॉन, जर्मनी की निवासी और जर्मन फ़ेडरल फंड्स में एक PSK की निदेशक मैकटेल ने कहा कि मनुष्य आज भी विश्व व्यवस्था के परिवर्तन की धुरी है और उसे जीवन/विकास का एक ऐसा मॉडल तैयार करना होगा जो पर्यावरण के साथ साथ उसके स्वयं के विनाश का कारण न बने।

“मेरा भविष्य, मेरा प्रयास” —की थीम पर आधारित इस कार्यशाला में श्रीअरविन्द अध्यन्न केंद्र ज्योतिर्मठ के अध्यक्ष अरविंद प्रकाश पंत, डॉ. मोहन सिंह रावत, केंद्र के कोषाध्यक्ष प्रकाश पँवार, संयुक्त सचिव और कवयित्री विनीता भट्ट, समाजसेवी और केंद्र के सचिव ओमप्रकाश डोभाल, डॉ. चरणसिंह केदारखंडी, हिंदुस्तान लिवर के पूर्व एच. आर . हेड चारु अधिकारी, डॉ. राजेन्द्र सिंह, डॉ. मंजीत बिष्ट, अनीता उनियाल , ‘खुशहाल धरती से खुशहाल जीवन’ का संदेश देने वाले युवा यशवीर सिंह, स्वामी समृद्ध पूरी जी, स्वामी शिवांग गिरी जी, योगाचार्य मोहित राणा , प्रतिभा बिष्ट, अरविंद खण्डवाल, किरण ,पूनम अग्रवाल,रेखा शर्मा, अनुपमा, विजयराज, मीनाक्षी, अपेक्षा सहित 35 प्रतिभागी उपस्थित रहे।

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