विश्व पर्यटन दिवस पर डॉ.चरण सिंह केदारखंडी की एक चिट्ठी

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मनमुक्त मौज के यायावर !

पर्यटन करना है बाहर

लेकिन रहना है थिर भीतर

बाहर प्रवाह में पूरा बहना है

भीतर सब कुछ निःशब्द कहना है,

भीतर अविचलित रहना है

और बाहर

विगलित हो जाना है !

 

घूमना है निरापद नीरव वन प्रान्तरों में

लेकिन

रखना है ध्यान कि

हिलांस और बुराँश तुम्हारी आहट से आहत न हों,

और असमय कुम्हलाने न लगें ब्रह्मकमल

तुम्हारे प्लास्टिक के ज़हर से

 

ध्यान रखना,

गाड़ियों की गर्द और कोलाहल से विकल लोग,

तुम्हारे न आने/न होने की दुआ न करें

 

बहुत सजगता से चलना है

वनवासी पथ पर

भुवनमोहिनी वनदेवियों के देश में

वर्ड्सवर्थ की तरह सुनना है:

‘पहाड़ी घसियारी का बेबूझ गीत’,

संस्कृति की सुवास को

दूर रखना है अपसंस्कृति की कीच से,

तभी…

जीत सकोगे जीवन के अवसाद से

और कर पाओगे चित्तशुद्धि

ध्यानस्थ दरख़्तों के देश में

 

कीट्स की कविता-सविता की तरह

बिना तोड़े घर लेकर आना है

बुग्याली फूल…

 

पलों के जीवन से

जीवन का पल चुराने वाले यायावर !

याद रखना :

जिस तहज़ीब से विश्व में विचरते हो तुम

उसी तर्बियत से यह विश्व विचरता/विकसता है तुममें !

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